*बुढ़ापा क्या है एक रस्म है*
रस्म सब को निभानी
आज नहीं तो कल
ये सबको आनी
क्योंकि जिंदगी की रवानी
अब यही से होकर जानी.....
बिखरते रिश्तों में खपा
खड़ा ये एकला अटुला बुढ़ापा
तिल तिल दिन गिनता
उखड़ी उखड़ी सांसे लेता
डग मग लकड़ी से पग भरता....
दिल डूबा, हुआ मन अजूबा
कांप कांपते हाथ
और धुंधली होती आंख
लेता गहराती सांस
समेटे पसरी जिंदगी की आस.....
जिंदगी का समय काट चुके
अरमान सारे मिट चुके
किसका लेना किसका देना
अब नहीं है कुछ शेष
कभी हंसता कभी रोता
जिंदगी का हिसाब संजोता......
दिल कमजोर मन कमजोर
झुर्रियों का दर्पण
धुंधली होती आंख
क्षीण होती आसा
समझे जो इशारे की भाषा......
पैरों में नहीं है जान
दांतों की गई अब शान
गालों की चली गई आन
सिर की दिखने लगी खाल
अब हाथ में नहीं है कोई माल.....
स्मृति होती नष्ट
रोग होता धृष्ट
शरीर में होता कष्ट
धीरे धीरे अहसास कराता
मृत्यु की तरफ धकेलता.....
पकड़ता ये जब खाट
लेकर अंत चिता की वाट
किये पाप और पुण्य
दिखाते चल चित्र की भांति
अब नहीं दिये में तेल और बाती....
धीरे धीरे अस्त होता
ये शरीर पनाह मांगता
क्षिण होते प्राण पखेरू
थक कर मृत्यु को तरसता
कहता अब......अलविदा
अलविदा....
अलविदा...
रचनाकार,
जयेश सोनी
20/04/25
4.30pm