Saturday, 19 February 2022

किनारा और नदी

 किनारा और नदी 

नदी कहती कल कल बहु 

किनारे बोले तुजे सम्हालू मेरी दो बाहों मे 

नदी गीत गाती किनारो के पत्थरो से टकरा कर 

किनारे ही तो ताल देते नदी के सुरो को'

नदी के साथ साथ चलते किनारे 

जब तक समंदर से मिल न जाती नदी 

किनारे पे जुलते वृक्ष घटा करते नदी पर 

उछलता  जल नदी का किनारो को भिगोता 

नदी का जन्म होता गिरिवर के अंचल से 

गिरिवर उसे किनारे के हवाले कर जमीं पर रखता 

चंचल नदी हे बिना किनारे के बिखर जाती 

अस्तित्व नदी का किनारो से ही होता है 

नदी के साथ साथ किनारे भी समंदर में खो जाते है 

बादल देते जल नदी को नदी देती उसे तपन