Saturday, 18 June 2016

श्रीकृष्ण शरणम् ममः सत्संग समिति


 श्रीकृष्ण शरणम् ममः सत्संग समिति 
उद्बोधन प्रारंभ.. २ मिनिट 

प्रातः स्मरणीय वैष्णव जन ,
श्रीकृष्ण शरणम् ममः सत्संग समिति का आप सभी  उपस्थित वैष्णव जनो को ह्रदय-पूर्वक जयश्रीकृष्ण। 
अखिल ब्रह्माण्ड के परम पिता परमेश्वर श्रीनाथजी के  अलौकिक स्वरुप की झाँखी हम सभी यहाँ परम भक्ति भाव  से करने आये  है साथ ही  पुष्टि मार्ग के भक्ति मार्ग को आत्मसात करते  हुए हम सभी दर्शन , धोल , संगीत एवं नृत्य के माध्यम से आज अपने -अपने  भावों का समर्पण  करेँगे।  

यहाँ पर आप अपने उच्चतम  भक्ति भाव के रस के साथ  उपस्थित रहे क्योकि सक्षात्कार के लिए श्रीजी बावा भाव का भूखा है।  सभी अपनी अपनी जगह पर शांति से बैठे अपने मोबाइल फ़ोन को शांत करे अवं अन्य लौकिक आवश्यक -अनावश्यक कार्यो की और से अपना ध्यान हटा लेवे तथा संपूर्ण ध्यान अपने श्रीजी बावा की ओर कर के दो मिनिट का समूह सत्संग करेंगे सभी साथ साथ बोले ........ 

श्रीकृष्ण शरणम ममः धोल .....३ मिनट 

तत पश्चात् 

श्री मंगलाचरण ---२ मिनट 

मंगला दर्शन का  महत्व ----२  मिनट। 

मंगला के दर्शन 


 श्रीनाथजी को मंगला के लिए जगाने का धोल अवं नृत्य --- ५ मिनिट

कृष्ण जाग, मोहन जाग  
नंद  के लाल, अब तो जाग 
प्यासी मेरी अखियाँ, दरश को आज 
कृष्ण जाग, मोहन जाग  नंद के लाल, अब तो जाग 
जाग...   जाग ...जाग ... अब तो जाग

१) भोर भयी, हे दुनिया के नाथ 
खड़ा है तेरे द्वार, दिनकर जोड़े हाथ,  
अब तो उठो, जगत के पालन-हार

कृष्ण जाग, मोहन जाग  नंद  के लाल, अब तो जाग ....... 


२) अब उठे- तब उठे, भक्त दे दे ये आवाज
सघरी अंखिया देखत राह ,सकल के हे राज  
निद्रा त्यागो,  हे..गैय्या के गोपाल 

कृष्ण जाग, मोहन जाग  नंद  के लाल, अब तो जाग ....... 


३) माँ यशोदा, देखन को खडी 
उठकर अलसाए, मेरे बिरज कुमार 
गोप-गोपी सब, संगत को है तैयार 

कृष्ण जाग, मोहन जाग  नंद के लाल, अब तो जाग 
प्यासी मेरी अखियाँ, दरश को आज 
कृष्ण जाग, मोहन जाग  नंद  के लाल, अब तो जाग 
जाग...   जाग ...जाग ... अबतो जाग 

  रचनाकर  :  जयेश सोनी  

श्री नाथजी  मंगला दरशन खोलना----   ५ मिनिट 
 साथ ही साथ पद गायन अवं नृत्य 


श्रृंगार के दर्शन 
१ 
आज अंग-अंग में जो संवारु, मेरे गोवर्धन धरण को
अन्तरमन मेरा प्यासा हे प्रभु, रस श्रृंगार धरण को। 
२ 
केसर स्नान करे श्रीजी, और धरु पीतांबर वाघा   
उपरणा- खेस मेरे लालन, ते लड़ी लड़ी वरण करावा।  
३ 
हाथ कंगन, नकेश्वर, और हिरे हडपची जग-मग लागे  
कनन कुंडल, हार-हंसाली, तारी शोभा अप्रितम लागे। 
४  
कडे कन्दोरो और बाजु बंद से , श्याम सुन्दर छवि लागे 
पठोन बिछियां, पग पान डाल, तोरी छटा न्यारी लागे।  
५  
दम दम दमके पन्ना मोती, और गूंजाजी की माला
तिलक झांखी कर हरख करे, आज व्रज की सब ये बाला। 
६  
महक मोगरा संग लाल गुलाब, गुंथे सखीरी माला 
करो श्रृंगार धर कमल छड़ी, मोहे मन किशनजी ग्वाला। 
७ 
मोर मुकुट, धरे पाघ पर , तब शोभा सलोनी सी लागे  
करो धारण बांसुरी मेरे कान्हा, और रसिक श्रृंगार भी जागे।  
 ८ 
पाय सोनेरी मोजड़ी, संग झांझर छमक छम छम बाजे  
हरि  मारो चले ठुमक -ठुम, घडी सुहानी सी लागे।  
९ 
घुमर केश में तेल सुगन्धित  हलके हाथ मलावो 
दर्पण दरश कराओ प्रभु ने, कालू टपकू शेष लगावो । 
१० 
आज शृंगार में वांरी वांरी जाऊ, मारो ह्रदय पुलकित होवे   
नज़र न लागे गिरिराज धरण को, शरण वैष्णव जन पावे।   


रचनाकार : जयेश सोनी 



ग्वाल के दर्शन 

ठुमकत रही गय्या, देखि राह नंद गोपाल
हाथ में हाथ ग्वाल के, छड़ी कंधे पे डाल 

देखती मय्या यशोदा, नटखट किकोल बाल
जग आनंद भयो, म्हारो कान जाये ग्वाल

गय्या मारे पैर हिलोरा, घुंघरू बजत जाय
कमर खेस बांधते, हरि मंद मंद मुसकाय 

आगे आगे गौरी दौड़े, पीछे हाकत हाथ
 देखो चले चले, वो जगत के पालन हार

बासुरी तान छेडे, होत मन प्राण विभोर
सब बने गोपी जब रास रचे नंदकिशोर

रचनाकार : जयेश सोनी
दिनांक : ०१-०९-२०१७


*ग्वाल के दर्शन*

ठुमकत रही गय्या, 
देखे राह नंद गोपाल....
हाथ में हाथ ग्वाल के,
छड़ी कंधे पे डाल....

देखती मय्या यशोदा,
 नटखट किकोल बाल....
जग आनंद भयो, 
म्हारो कान जाये ग्वाल...

गय्या मारे पैर हिलोरा,
 घुंघरू बजत जात...
कमर खेस बांधते,
हरि मंद मंद मुसकात....

आगे आगे गौरी दौड़े, 
पीछे हाकत हाथ....
देखो चले चले वो,
जग के पालक साथ....

बासुरी तान छेडे,
होत मन प्राण विभोर....
सब बने गोपी जब, 
रास रचे नंदकिशोर....

✒️रचनाकार : 
जयेश सोनी
दिनांक : ०१-०९-२०१७