पराई कन्या....(कोरोना)
जिंदगी तू अब होले होल मुस्कराने लगी है,
कुछ खुश और कुछ आसां सी लगने लगी है....
क्या बयाँ करू में,
तरकश से निकले क्या क्या तीर है तेरे,
सीने पे सुर्ख निशां है तेरे,
बस रोते बिखलते घर है तेरे.....
बहुत ख़ौफ़ ज़दा था,
मंज़र भयावाह था,
सन्नाटे में आवाम था,
रौशनी का क़तरा भी
नज़र न आ रहा था....
सहमे सहमे थे चहरे,
टिकटिकी से लगाये,
अनबूझे सवालों के सायें,
सिर्फ अखबारों को पलटाये.....
मिलों तक सड़के सुनी, बाज़ार सुने,
इक्का दुक्का वाहन आने जाने,
हर शटर पे थे ताले,
सब कुछ ऊपरवाले के हवाले.....
चलते चलते आशियाने की ओर जाने,
हज़ारो मील मंज़िल को पाने,
भूख प्यास का था सैलाब,
पैरों में पड़ते छालों का क्या हिसाब....
तलाश थी,
जेद्दोंजहद थी,
जिंदा रहने की धुंधली सी आस थी,
न कोई आब न आकाश नज़र आये,
न नासूर से लड़ने का कोई ख्वाब भी नज़र आये,
खंज़र सी नोक चल रही थी,
धड़कन से निशां बन रही थी,
थे सिर्फ खबरों के मंज़र,
थी नई मौत के सरमाये पर सबकी नज़र...
सरकारें थी पुलिस डॉक्टर नर्स सब थे,
न था किसी के बस में,
श्मशान में कतारें थी, इंतज़ार करती बेसहारा लाशें थी.....
थी तब भी.....
दूर दूर तक कोई आशा,
बार बार ढ़ाढस देते,
झटकार देते थे निराशा,
न छोड़ी थी ऐ जिंदगी तेरी किसीने अभिलाषा....
अब दूर नही वो दिन,
पूरे हो गए कोरोना तेरे सो दिन,
वतन ए हाला देख चुका है तेरा रंग,
चाहे मिलकर भीे तू रहना चाहे हमारे संग,
पर एक दिन तो तुझे जाना है,
हमे कुदरत को भी मनाना है,
अरे आगोश में ले चुकी तू,
जितना तुजे सताना है,
पराई कन्या जैसे विदा कर
हमे तेरा मोल चुकाना है....
हमे तेरा मोल चुकाना है....
रचना .....
जयेश सोनी
1 11 2020