किनारा और नदी
नदी कहती कल कल बहु
किनारे बोले तुजे सम्हालू मेरी दो बाहों मे
नदी गीत गाती किनारो के पत्थरो से टकरा कर
किनारे ही तो ताल देते नदी के सुरो को'
नदी के साथ साथ चलते किनारे
जब तक समंदर से मिल न जाती नदी
किनारे पे जुलते वृक्ष घटा करते नदी पर
उछलता जल नदी का किनारो को भिगोता
नदी का जन्म होता गिरिवर के अंचल से
गिरिवर उसे किनारे के हवाले कर जमीं पर रखता
चंचल नदी हे बिना किनारे के बिखर जाती
अस्तित्व नदी का किनारो से ही होता है
नदी के साथ साथ किनारे भी समंदर में खो जाते है
बादल देते जल नदी को नदी देती उसे तपन